(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

महाप्रस्थानिकपर्व


॥ श्रीः ॥
17.2. अध्यायः 002
Mahabharata - Mahaprasthanika Parva - Chapter Topics
मेरुगिरिंप्रति गच्छन्तं युधिष्ठिरं ज्येष्ठ्यक्रमादनुगच्छत्सु दौपद्यादिषु योगभ्रंशात्क्रमेण भूमौ निपतत्सु भीमप्रश्नात्तं प्रति युधिष्ठिरेण तेषां पतने हेतुकथनम्॥ 1 ॥ तथा ततः शुना केवलमनुगम्यमानेन सता पुरोगमनम्॥ 2 ॥
Mahabharata - Mahaprasthanika Parva - Chapter Text

वैशम्पायन उवाच।

ततस्ते नियतात्मान उदीचीं दिशमास्थिताः।
ददृशुर्योगयुक्ताश्च हिमवन्तं महागिरिम्॥ 17-2-1(98364)
तं चाप्यतिक्रमन्तस्ते ददृशुर्वालुकार्णवम्।
अवैक्षन्त महाशैलं मेरुं शिखरिणां वरम्॥ 17-2-2(98365)
तेषां तु गच्छतां शीघ्रं सर्वेषां योगधार्मिणाम्।
याज्ञसेनी भ्रष्टयोगा निपपात महीतले॥ 17-2-3(98366)
तां तु प्रपतितां दृष्ट्वा भीमसेनो महाबलः।
उवाच धर्मराजानं याज्ञसेनीमवेक्ष्य ह॥ 17-2-4(98367)
नाधर्मश्चरितः कश्चिद्राजपुत्र्या परंतप।
कारणं किंनु तद्ब्रूहि यत्कृष्णा पतिता भुवि॥ 17-2-5(98368)
युधिष्ठिर उवाच। 17-2-6x(8077)
पक्षपातो महानस्या विशेषेण धनंजये।
तस्यैतत्फलमद्यैषा भुङ्क्ते पुरुषसत्तम॥ 17-2-6(98369)
वैशम्पायन उवाच। 17-2-7x(8078)
एवमुक्त्वाऽनवेक्ष्यैनां ययौ भरतसत्तमः।
समाधाय मनो धीमान्धर्मात्मा पुरुषर्षभः॥ 17-2-7(98370)
सहदेवस्ततो विद्वान्निपपात महीतले।
तं चापि पतितं दृष्ट्वा भीमो राजानमब्रवीत्॥ 17-2-8(98371)
योऽयमस्मासु सर्वेषु शुश्रूषुरनहंकृतः।
सोयं माद्रवतीपुत्रः कस्मान्निपतितो भुवि॥ 17-2-9(98372)
युधिष्ठिर उवाच। 17-2-10x(8079)
आत्मनः सदृशं प्राज्ञं नैषोऽमन्यत कञ्चन।
तेन दोषेण पतितो विद्वानेष नृपात्मजः॥ 17-2-10(98373)
वैशम्पायन उवाच। 17-2-11x(8080)
इत्युक्त्वा तं समुत्सृज्य सहदेवं ययौ तदा।
भ्रातृभिः सह कौन्तेयः शुना चैव युधिष्ठिरः॥ 17-2-11(98374)
कृष्णं निपतितां दृष्ट्वा सहदेवं च पाण्डवम्।
आर्तो बन्धुप्रियः शूरो नकुलो निपपात ह॥ 17-2-12(98375)
तस्मिन्निपतिते वीरे नकुले चारुदर्शने।
पुनरेव तदा भीमो राजानमिदमब्रवीत्॥ 17-2-13(98376)
योऽयमक्षतधर्मात्मा भ्राता वचनकारकः।
रूपेणाप्रतिमो लोके नकुलः पतितो भुवि॥ 17-2-14(98377)
इत्युक्तो भीमसेनेन प्रत्युवाच युधिष्ठिरः।
नकुलं प्रति धर्मात्मा सर्वबुद्धिमतांवरः॥ 17-2-15(98378)
रूपेणि मत्समो नास्ति कश्चिदित्यस्य दर्शनम्।
अधिकश्चाहमेवैक इत्यस्य मनसि स्थितम्॥ 17-2-16(98379)
नकुलः पतितस्तस्मादागच्छ त्वं वृकोदर।
यस्य यद्विहितं वीर सोऽवश्यं तदुपाश्नुते॥ 17-2-17(98380)
तांस्तु प्रपतितान्दृष्ट्वा पाण्डवः श्वेतवाहनः।
पपात शोकसंतप्तस्ततोनु परवीरहा॥ 17-2-18(98381)
तस्मिंस्तु पुरुषव्याघ्रे पतिते शक्रतेजसि।
म्रियमाणे दुराधर्षे भीमो राजानमब्रवीत्॥ 17-2-19(98382)
अनृतं न स्मराम्यस्य स्वैरेष्वपि महात्मनः।
अथ कस्य विकारोऽयं येनायं पतितो भुवि॥ 17-2-20(98383)
युधिष्ठिर उवाच। 17-2-21x(8081)
एकोहं निर्दहेयं वै शत्रूनित्यर्जुनोऽब्रवीत्।
न च तत्कृतवानेष शूरमानी ततोपतत्॥ 17-2-21(98384)
अवमेने धनुर्ग्राहानेष सर्वांश्च फल्गुनः।
तथा चैतन्न तु तथा कर्तव्यं भूतिमिच्छता॥ 17-2-22(98385)
वैशम्पायन उवाच। 17-2-23x(8082)
इत्युक्त्वा प्रस्थितो राजा भीमोथ निपपात ह।
पतितश्चाब्रवीद्भीमो धर्मराजं युधिष्ठिरम्॥ 17-2-23(98386)
भोभो राजन्नवेक्षस्व पतितोहं प्रियस्तव।
किंनिमित्तं च पतनं ब्रूहि मे यदि वेत्थ ह॥ 17-2-24(98387)
युधिष्ठिर उवाच। 17-2-25x(8083)
अतिभुक्तं च भवता प्राणेन च विकत्थसे।
अनवेक्ष्य परं पार्थ तेनासि पतितः क्षितौ॥ 17-2-25(98388)
इत्युक्त्वा तं महाबाहुर्जगामानवलोकयन्।
श्वाप्येकोनुययौ यस्ते बहुशः कीर्तितो मया॥ ॥ 17-2-26(98389)

इति श्रीमन्महाभारते महाप्रस्थानिकपर्वणि द्वितीयोऽध्यायः॥ 2 ॥

Mahabharata - Mahaprasthanika Parva - Chapter Footnotes
7-2-1 ततो दिक्त्रयप्रदक्षिणीकरणानन्तरम्। योगयुक्ताः समाहितमनसः॥ 7-2-3 भ्रष्टयोगा ध्यानात् स्खलितमानसा॥ 7-2-7 अनवेक्ष्य स्वर्गान्तरायरूपः स्नेहो माभूदिति भावः॥


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